Thursday 29 January 2009

छात्र नेताओं का विद्रुप चेहरा


प्रधानाचार्य शशिभूषण प्रमाणिक की उनके घर में ही हत्या कर दी गयी.

गिरफ्तार छात्र संघ अध्यक्ष अर्जुन पूर्ति.

रांची विश्वविद्यालय के बहरागोड़ा कॉलेज में बीएड घोटाले की बात खुलकर सामने आ गयी है. बहरागोड़ा कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष अर्जुन पूर्ति ने वहां के प्रधानाचार्य शशिभूषण प्रमाणिक के साथ सांठगांठ कर जिस तरह से बीएड नामांकन में घपला किया उससे छात्र संगठनों की जरूरत और भूमिका पर कई सवालिया निशान लग गये हैं. झारखंड में पहली बार वर्ष 2007 में छात्र संघ चुनाव कराये गये. कॉलेज कैंपस के माहौल को सुधारने की इससे उम्मीद जगी. लेकिन पिछले डेढ़ साल में जो कुछ देखने को मिला, उसने छात्र राजनीति की दिशा और दशा पर फिर से सोचने को विवश किया है. जमशेदपुर के को-आपरेटिव कॉलेज में छात्र संघों के बीच भिड़ंत ने जहां इसके हिंसक स्वरूप को सामने लाया, वहीं बहरागोड़ा कॉलेज के मामले ने छात्र नेताओं के “दलाल संस्कृति‘ को उजागर किया है.
ऐसा नहीं है कि पहले कॉलेजों में इस तरह की “दलाल संस्कृति‘ नहीं थी. लेकिन छात्र संघ के चुनाव ने उसे संगठनात्मक रूप देने का काम किया है. छात्र संघ के चुनाव के बाद कुछ छात्र नेताओं को लाइसेंस मिल गया कि वह छात्रों और कॉलेज प्रबंधन से भयादोहन कर सकें. उन्हें ब्लैकमेल कर सकें. छात्र संघ का चुनाव जीतकर पहुंचे इन छात्र नेताओं को लगा कि उनके साथ युवा शक्ति है. और उन्होंने इसका गलत उपयोग करना शुरू कर दिया. ऐसे कॉलेज प्रबंधन और वहां के शिक्षक जो अब तक नामांकन और परीक्षाओं में भ्रष्ट आचरण के लिए छात्रों से सीधे बात करता था, उसे एक बना-बनाया संगठन मिल गया. अब भ्रष्ट सिस्टम और छात्र के बीच ऐसे छात्र नेता आ चुके हैं, जो “दलाल‘ की भूमिका में हैं. ये “दलाल‘ ही आने वाले समय में झारखंड की राजनीति के झंडाबरदार होंगे. कहा भी गया है कि छात्र संगठन सक्रिय राजनीति की पहली सीढ़ी है. वह सीढ़ी अपने निर्माण काल में ही भ्रष्टाचार और दबंगई की नींव पर रख दी गयी है. शायद इन्हीं दुश्चिंताओं के कारण गांधीजी छात्र राजनीति और कैंपस पॉलिटिक्स के सख्त खिलाफ थे. हालांकि वे यह जरूर चाहते थे कि छात्र और युवा देश के निर्माण में सक्रिय योगदान दें. वह युवाओं को देश के विकास की कुंजी मानते थे. आज के छात्र संगठनों के राजनीतिकरण, अपराधीकरण और भ्रष्ट आचरण ने इसकी सार्थकता खत्म कर दी है. छात्र संगठनों को इससे ऊपर उठकर छात्र और कैंपस हित में काम करना होगा, तभी सही मायने में “युवा भारत‘ का निर्माण संभव हो पायेगा.

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